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Lok Sabha Election 2019 : Uttar Pradesh के बुलंदशहर जनपद से एक बेहद हैरान कर देने वाली घटना प्रकाश में आई है। एक युवक ने अपनी उंगली को गंडासे से काट डाला। इसके पीछे की वजह ये है कि वो वोट BSP को देना चाहता था लेकिन गल्ती से वोट BJP के चुनाव निशान वाले कमल पर दब गया। बस इसी बात पर वो इतना गुस्सा हो गया कि घर पहुंचकर उसने गंडासे से अंगुली पर प्रहार कर दिया। लहूलुहान हालत में परिवार के लोग उसे अस्पताल ले गए, जहां से इलाज के बाद उसे छुट्टी दे दी गई।


YOGESH TRIPATHI


गल्ती से डाल दिया BJP को वोट


18 अप्रैल को लोकसभा चुनाव के दूसरे चरण की वोटिंग थी। बुलंदशहर में भी वोट डाले गए। यहां से लोकसभा सीट पर बीजेपी से भोला सिंह, कांग्रेस से बंसी पहाड़िया और बीएसपी (गठबंधन) से योगेश वर्मा प्रत्याशी हैं। पवन नाम का युवक BSP को वोट डालना चाहता था लेकिन उसने गलती से बीजेपी को वोट डाल दिया।

गंडासे से उंगली पर किया प्रहार


पवन को अपनी गल्ती पर बेहद गुस्सा आया और घर पहुंचने पर उसने गंडासे से उंगुली पर प्रहार कर दिया। लहूलुहान हालत में परिवार के लोग उसे हॉस्पिटल ले गए। भाई ने बताया कि अपनी गलती की वजह से पवन गुस्से में था। पवन ने मीडिया से बात करते हुए कहा कि जब वो वोटिंग के लिए पहुंचा तो जल्दीबाजी में गलत बटन दबा दिया। इस बात से वो खुद से ही नाराज हो गया। इसके बाद घर पहुंच कर उसने गंडासे से अपनी उंगली को काट कर अलग कर दिया।

 

 
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Lok Sabha Election 2019 की नामांकन प्रक्रिया के बाद अब Kanpur सीट पर विजयश्री के लिए "शह-मात" का खेल Start हो गया है। @INCIndia प्रत्याशी श्रीप्रकाश जायसवाल (@SPJaiswalKanpur) BJP के दो मजबूत “किला” ढहाने की मुहिम में जुट गए हैं। इसके लिए उन्होंने अपने “योद्धाओं” की तैनाती भी कर दी है। 5 में से 3 विधान सभाओं में उन्होंने "कांटे से कांटा" निकालने के लिए "जनेऊ धारी" नेताओं को बागडोर सौंपी है। ब्राम्हण बाहुल्य किदवईनगर और गोविंदनगर के साथ-साथ आर्यनगर में चुनाव की कमान ब्राम्हण नेताओं के पास रहेगी। आर्यनगर विधान सभा की कमान वहां के वर्तमान विधायक सोहेल अंसारी के पास रहेगी। जबकि अपने बेहद विश्वास पात्र संजीव दरियाबादी को उन्होंने सीसामऊ के मोर्चे पर लगाया है।


Yogesh Tripathi


आलोक मिश्रा के हाथों में सौंपी किदवईनगर की बागडोर


शहर के प्रतिष्ठित डीपीसी स्कूल के प्रबंधक आलोक मिश्रा पुराने और दिग्गज कांग्रेसी नेता हैं। आलोक मिश्रा की धर्मपत्नी बंदना मिश्रा दो साल पहले कांग्रेस के टिकट पर मेयर का चुनाव लड़ चुकी हैं। आलोक मिश्रा के अनुभवों और ब्राम्हणों के बीच बेहतर संपर्क होने की वजह से श्रीप्रकाश ने उनको किदवईनगर विधान सभा की जिम्मेदारी दी है। आलोक मिश्रा के साथ शहर के वरिष्ठ अधिवक्ता और कांग्रेस कमेटी के महासचिव संदीप शुक्ला को भी जिम्मेदारी दी गई है। ये दोनों नेता किदवईनगर विधान सभा में कांग्रेस प्रत्याशी को जिताने के लिए न सिर्फ हर रणनीति बनाएंगे बल्कि बीजेपी प्रत्याशी से नाराज विरोधियों को जोड़ने का काम भी करेंगे।

https://twitter.com/SPJaiswalKanpur/status/1116388376834260992

आलोक मिश्रा चूंकि पहले कई चुनाव लड़ चुके हैं इस लिए उन पर अधिक विश्वास कर किदवईनगर जैसी विधान सभा का जिम्मा सौंपा गया है। पिछले चुनावों के परिणामों पर यदि गौर करें तो किदवई नगर विधान सभा बीजेपी के लिए “संजीवनी” का काम करती रही है। यही वजह है कि इस बार कांग्रेस प्रत्याशी श्रीप्रकाश का फोकस यहां पर है। पिछले दो दिनों से वे खुद संजय वन, किदवईनगर, नौबस्ता समेत कई एरिया में चाय पर चर्चा करते नजर आ चुके हैं। खास बात ये है कि इस बार यहां पिछले चुनाव में भाजपा को वोट करने वाले कुछ प्रतिशत वोटर्स कांग्रेस में डॉयवर्ट हो सकता है।


शैलेंद्र दीक्षित को मिली गोविंदनगर की कमान


कांग्रेसी नेता शैलेंद्र दीक्षित की गिनती श्रीप्रकाश के बेहद खास लोगों में होती है। श्रीप्रकाश की पहल पर ही 2012 के चुनाव में कांग्रेस ने शैलेंद्र दीक्षित को गोविंदनगर विधान सभा सीट से प्रत्याशी बनाया था। इस चुनाव में शैलेंद्र दीक्षित बीजेपी के सत्यदेव पचौरी से हार गए थे लेकिन उन्हें करीब 52 हजार के आसपास वोट मिले थे। यही वजह है कि शैलेंद्र दीक्षित को गोविंदनगर विधान सभी की जिम्मेदारी दी गई है। हालांकि अंदरखाने की जो रिपोर्ट है उसके मुताबिक इस विधान सभा एरिया श्रीप्रकाश का “किला” इस बार काफी मजबूत है। उसके पीछे कई वजहें भी हैं। जानकारों की मानें तो बीजेपी को इस बार सबसे अधिक नुकसान रतनलाल नगर मंडल के 6 वार्डों में हो सकता है। इसके संकेत भी अभी से दिखने लगे हैं। कुछ कद्दावर कांग्रेस प्रत्याशी श्रीप्रकाश का समर्थन खुल्लम-खुल्ला कर रहे हैं।

हरप्रकाश अग्निहोत्री संभालेगें अपना ही “घर”


शहर कांग्रेस अध्यक्ष हरप्रकाश अग्निहोत्री को अपना “घर” (आर्यनगर विधान सभा) संभालने की जिम्मेदारी दी गई है। हरप्रकाश का घर भी इसी विधान सभा के अंतर्गत आता है। उनकी क्षेत्र में काफी तगड़ी पैठ करीब-करीब हर वर्ग और जाति के बीच है। बेहद मृदुभाषी हरप्रकाश के साथ कुछ और लोगों को भी उनके सहयोगी के तौर पर लगाया गया है।

सीसामऊ के मोर्चे पर तैनात किए गए संजीव दरियाबादी


शहर में कांग्रेस प्रत्याशी के यदि कुछ विश्वासपात्र लोगों की बात की जाए तो उसमें एक नाम पूर्व विधायक संजीव दरियाबादी का भी है। दोनों के बीच बांडिंग भी काफी अच्छी है। संजीव दरियाबादी को सीसामऊ विधान सभा की जिम्मेदारी मिली है। चूंकि इस विधान सभा एरिया में दलितों का वोट बैंक ठीक-ठाक है। संजीव की अपनी बिरादरी के साथ-साथ अन्य जाति के वोटों पर भी बेहतर पकड़ है इस लिए उनको सीसामऊ की कमान दी गई।

विधायक सोहेल अंसारी को कैंट का दायित्व


मोदी और बीजेपी लहर में भी कैंट विधान सभा का चुनाव जीतने वाले कांग्रेस विधायक को उनकी ही विधान सभा का जिम्मा दिया गया है। यहां मुस्लिम वोटर्स काफी तादात में हैं। इन पर सोहेल अंसारी की तगड़ी पकड़ है। यहां भी सोहेल के साथ कुछ अन्य कांग्रेसी कार्यकर्ताओं की टीम को लगाया गया है।

20 अप्रैल के बाद हो सकता है प्रियंका गांधी का रोड शो


कानपुर में चुनाव चौथे चरण यानि 29 अप्रैल को है। सिर्फ 16 दिन बचे हैं जब जनता वोट की चोट करेगी लेकिन खास बात ये है कि अभी तक चुनावी शोर कहीं नजर नहीं आ रहा है। बड़े सूत्रों की मानें तो इसके पीछे भी कांग्रेस की प्लानिंग गजब की है। कांग्रेस अभी तीन-चार दिन और चुनावी शोर नहीं मचाएगी। इसके बाद अचानक चुनाव प्रचार को काफी गति देगी। चर्चा है कि 20 अप्रैल के बाद कभी भी प्रियंका गांदी का रोड शो हो सकता है। इस लिए अलग से प्लानिंग की जा रही है कि प्रियंका का किस एरिया में रोड शो कराने से कांग्रेस प्रत्याशी को लाभ होगा और बीजेपी प्रत्याशी को नुकसान। माना जा रहा है कि प्रियंका का रोड शो South City की सड़कों और गलियों में होगा।

कांग्रेस प्रत्याशी श्रीप्रकाश जायसवाल () Kanpur से तीन बार सांसद रह चुके हैं। साथ ही वे केद्रीय मंत्री भी UPA की सरकार में रहे हैं। इससे पहले वे उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी के प्रदेश अध्यक्ष भी थे। वे कानपुर के महापौर भी रह चुके हैं। श्रीप्रकाश के सामने बीजेपी ने यूपी की योगी सरकार के कैबिनेट मंत्री सत्यदेव पचौरी को “चुनावी रण” में उतारा है।  


 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

चुनाव आयोग ने अभी 2019 के लोकसभा चुनाव का “शंखनाद” नहीं किया है लेकिन SP हो या फिर BSP, दोनों दलों में दिग्गजों ने बगावत का “शंखनाद” शुरु कर दिया है। गठबंधन के तहत Fatehpur की लोकसभा सीट बसपा के खाते में गई है। अंदर की खबर ये है कि बीएसपी सुप्रीमों यहां से अपनी सरकार में पूर्व मंत्री रहे एक दिग्गज को टिकट दे सकती हैं। लेकिन तगड़ा झटका सपा के पूर्व सांसद राकेश सचान को लगा है। 2014 में हार के बाद वे लगातार न सिर्फ फतेहपुर में सक्रिय थे बल्कि कार्यकर्ताओं और जनता का दुःख दर्द बांट रहे थे। खबर आ रही है कि जल्द ही जल्द ही वे कांग्रेस का “हाथ” थाम सकते हैं। हालांकि उनको ऑफर BJP की तरफ से भी है।


[caption id="attachment_18897" align="aligncenter" width="650"] राकेश सचान पूर्व सांसद (समाजवादी पार्टी, फतेहपुर)[/caption]

YOGESH TRIPATHI


5 साल से बूथ पर कार्यकर्ताओं की टीम खड़ी की


फतेहपुर प्रतिनिधि के मुताबिक राकेश सचान 2014 का चुनाव हारने के बाद घर पर नहीं बैठे बल्कि कार्यकर्ताओं के साथ हमेशा खड़े रहे। जनता के बीच में रहे। सभी के सुख-दुःख में शामिल होते रहे। सपा हाईकमान ने भी उनको चुनाव लड़ने के लिए आश्वास्त कर रखा था। जब ये सीट बसपा के खाते में गई तो राकेश सचान ने सपा सुप्रीमों से बात की। कहा जा रहा है कि इसके बाद भी उनको यही आश्वासन मिला कि सबकुछ ठीक हो जाएगा।

BJP के भी संपर्क में है राकेश सचान


जानकार सूत्रों की मानें तो राकेश सचान सिर्फ कांग्रेस ही नहीं बल्कि बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व के संपर्क में बराबर हैं। समर्थकों के साथ वे दिल्ली में ही डटे है। चर्चा ये भी है कि शिवपाल सिंह यादव की तरफ से भी उनको कुछ दिन पहले ऑफर मिला था लेकिन राकेश सचान ने हामी नहीं भरी। इसके बाद बीजेपी की तरफ से उनसे संपर्क किया गया लेकिन किसी दूसरी सीट के लिए।

डीएवी छात्रसंघ का चुनाव नहीं जीते लेकिन विधायक पहली बार में ही बने


राकेश सचान ने नब्बे के दशक में कानपुर के डीएवी कॉलेज से छात्र राजनीति की शुरुआत की। महामंत्री पद पर वे कई बार चुनाव लड़े लेकिन जीत नसीब नहीं हुआ। वर्ष वे जनता दल के टिकट पर घाटमपुर से पहली बार विधायक बने। जनता दल के टूटने के बाद वे सपा सुप्रीमों मुलायम सिंह के करीब आ गए। 2002 में वह फिर विधायक बने। 2009 में मुलायम सिंह ने उनको फतेहपुर से लोकसभा का टिकट दिया और राकेश चुनाव जीतकर पहली बार संसद में पहुंचे। 2014 लोकसभा चुनाव में उनको मोदी लहर में करारी शिकस्त मिली थी।

किसी भी नए विवाद से बचने के लिए Congress हाईकमान फूंक-फूंक कर कदम रख रहा है। कांग्रेस के जनरल सेकेट्री ज्योतिरादित्य सिंधिया का बुन्देलखंड से बेहद खास है। उनको पहले बुन्देलखंड की सभी चारों सीटों का दायित्व दिया जाना था लेकिन फिर अचानक ये सीटें राष्ट्रीय महासचिव प्रियंका गाँधी वाड्रा के हिस्से में देने के लिए कांग्रेस हाईकमान को बाध्य होना पड़ा। इसके पीछे एक लंबा-चौड़ा इतिहास है।


[caption id="attachment_18893" align="alignnone" width="695"] ज्योतिरादित्य सिंधिया (जनरल सेकेट्री, कांग्रेस)[/caption]

Dr. Rakesh Deivedi


1857 की स्वाधीनता आंदोलन को लेकर खड़ा हो सकता था “बवंडर”


कांग्रेस को डर सताया कि भाजपा सिंधिया खानदान की 1857 स्वाधीनता आन्दोलन मे भूमिका को लेकर नया “बवंडर” खड़ा कर सकती है। कार्यकर्ताओं की ओर से भी इसको लेकर आपत्ति जताई गई थी।  नई ऊर्जा के साथ मैदान में आने को काँग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गाँधी ने यूपी को पूर्वी और पश्चिम उत्तर प्रदेश में बाँटा है। प्रियंका गाँधी के पास पूर्वी उत्तर प्रदेश तथा ज्योतिरादित्य सिंधिया के जिम्मे पश्चिमी उत्तर प्रदेश की कमान है। सूत्रों के अनुसार सिंधिया को पहले बुंदेलखण्ड की चारों लोक सभा सीटों झाँसी, जालौन, बांदा, हमीरपुर का भी कामकाज सम्भालना था। यह करीब -करीब तय हो चुका था। जब सीटों के वितरण पर बुंदेलखण्ड के कांग्रेस कार्यकर्ताओं को सुराग लगा तो वे चिंतित होने लगे । सभी को भाजपा के प्रोपेगन्डा का भय सताने लगा। तब राहुल -प्रियंका को मेल करके इस सम्बन्ध में अपनी आपत्ति जताई गई।

ग्वालियर रियासत के राजा थे ज्योतिरादित्य सिंधिया के पूर्वज


ज्योतिरादित्य सिंधिया के पूर्वज जयाजी राव सिंधिया जो कि 1857 में ग्वालियर रियासत के राजा थे। उन पर उस वक्त अँग्रेजों का साथ देने का दाग लगा था। कालपी में हारने के बाद लक्ष्मीबाई,  रावसाहब, तात्या ,नवाब से अँग्रेजों से लोहा लेने की चर्चा कर रहीं थीं।  इस दौरान रानी ने कहा "अब तक हम लोग जहाँ-जहाँ अँग्रेजों से जमकर लड़ पाये, वहाँ-वहाँ किलों का आश्रय लेकर। फिर किसी मजबूत किले को हाथ में करना चाहिये । ग्वालियर के बारे में पुन: पूरी वस्तु स्थिति पता कर उस पर आक्रमण कर देना चाहिये । राजा और वहाँ के दो तीन सरदार अंग्रेज कंपनी के पक्षपाती हैं, लेकिन पूरी सेना और जनता नहीं। सेना यदि पूरी प्रबलता के साथ हमारा पक्ष नहीं भी पकडेगी तो वह ढुलमुल अवश्य रहेगी"।

अंग्रेजों की तरफ से थी राजा को 10 हजार सैनिक रखने का अनुमति


ग्वालियर में उस वक्त सिन्धिया के 10 हजार की सेना रखने का अधिकार अँग्रेजों ने दे रखा था। अँग्रेजों  की मिलीभगत से अंग्रेजी और मराठी जानने वाले दिनकरराव को ग्वालियर रियासत का रेजिडेंट बनाकर बैठा दिया था। महाराजा के परामर्शदाता के रूप में तैनात दिनकरराव का कामकाज पर पूरा दखल रहता था। बताया जाता है कि दिनकरराव राजबाडे की चालाकी की वजह से नाबालिग जयाजीराव को महाराजा की मान्यता के बदले अँग्रेजों से मोहना में एक सन्धि करनी पड़ी थी। जिसमें सिन्धिया सेना को यद्ध के दौरान अँग्रेजों का साथ देने की शर्त शामिल थी।
जब रानी के नेतृत्व में सेना ग्वालियर आईं थी तो सिन्धिया की सेना ने रानी का साथ दिया था जिससे ग्वालियर पर उनका कब्जा हो गया था । इसके बाद दिनकरराव ने सन्धि का हवाला देकर अँग्रेजों की कब्जे वाली सेना का नेतृत्व करने को विवश कर दिया था। अपने महाराज को सेनापति बना देख सेना ने रानी के लड़ाकों का साथ छोड़ दिया, इससे रानी लक्ष्मीबाई की सेना हार गई । जयाजी राव सिन्धिया की उस वक्त शर्तों की जो भी मजबूरी रही हो पर इतिहास में लिखा यह निष्कर्ष नहीं बदल सकता कि झाँसी की रानी का साथ ग्वालियर के राजा ने नहीं दिया। अपना पद बचाने को उन पर मोह हावी हो गया। यदि सिन्धिया ने रानी का खुलकर साथ दिया होता तो इतिहास कुछ दूसरा ही लिखा जाता।

22 मई 1858 को रानी लक्ष्मी बाई की सेना हार गई


कानपुर ,बिठूर और झाँसी की रक्त रंजित लड़ाई के बाद विद्रोही सेनाएं कालपी होकर ग्वालियर आई तो इन्दौर की सेना भी आगरा तक आ गई थी। तब सिन्धिया को चिठ्ठी भेजकर मदद मांगी गई थी पर दिनकरराव की बिछाई गई बिसात में फँसकर जयाजीराव ऐसा नहीं कर पाये। नतीजतन 22 मई 1858 को विद्रोही सेना हार गई थी और इस हार के लिये इतिहास में जिम्मेदार सिन्धिया बने।  झाँसी सहित आसपास के क्षेत्र में लक्ष्मीबाई का आज भी आदर है। ज्योतिरादित्य का सम्बन्ध उसी ग्वालियर घराने से है।

BJP हाईकमान को भेजी जा चुकी है रानीलक्ष्मी बाई की कविता


इसलिये चुनाव के दौरान 1858 की उस भूमिका का उठने का डर कांग्रेसियों को सता गया। पार्टी कार्यकर्ताओं को यह आशंका सताने लगी कि भाजपा इतिहास को खंगालने में देर नहीं लगाएगी। ऐसे में प्रियंका -सिन्धिया को नई भूमिका मिलने की जो खुशी मनाई जा रही थी ,फिर 1858का लगे दाग को डैमेज कंट्रोल करने में माथा -पच्ची करनी होती । रानी लक्ष्मीबाई की बहादुरी पर लिखी गई कविता -"खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी " की तलाश कर अपने नेतृत्व के पास भेजी जा रही है। उस पंक्ति को अंडर लाइन किया जा रहा है ,जिसमें ग्वालियर के महाराजा की भूमिका पर सवाल उठाये गये थे। उस कविता में लिखी गई लाइन इस प्रकार है- विजयी रानी आगे चल दी ,किया ग्वालियर पर अधिकार । अँग्रेजों के मित्र सिन्धिया ने छोड़ी रजधानी थी।। सूत्रों के अनुसार इतिहास को आधार बनाकर भाजपा कोई नया शिगूफा न छेड़ दे , इससे सावधान होकर फिर प्रियंका गांधी ने यहाँ की चारों सीटों को अपनी लिस्ट में शामिल करने का निर्णय लिया। राहुल गाँधी भी यही चाहते थे ।

[caption id="attachment_18873" align="alignright" width="387"] A Report By Dr.Rakesh Dwivedi (Orai)
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