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किसी भी नए विवाद से बचने के लिए Congress हाईकमान फूंक-फूंक कर कदम रख रहा है। कांग्रेस के जनरल सेकेट्री ज्योतिरादित्य सिंधिया का बुन्देलखंड से बेहद खास है। उनको पहले बुन्देलखंड की सभी चारों सीटों का दायित्व दिया जाना था लेकिन फिर अचानक ये सीटें राष्ट्रीय महासचिव प्रियंका गाँधी वाड्रा के हिस्से में देने के लिए कांग्रेस हाईकमान को बाध्य होना पड़ा। इसके पीछे एक लंबा-चौड़ा इतिहास है।


[caption id="attachment_18893" align="alignnone" width="695"] ज्योतिरादित्य सिंधिया (जनरल सेकेट्री, कांग्रेस)[/caption]

Dr. Rakesh Deivedi


1857 की स्वाधीनता आंदोलन को लेकर खड़ा हो सकता था “बवंडर”


कांग्रेस को डर सताया कि भाजपा सिंधिया खानदान की 1857 स्वाधीनता आन्दोलन मे भूमिका को लेकर नया “बवंडर” खड़ा कर सकती है। कार्यकर्ताओं की ओर से भी इसको लेकर आपत्ति जताई गई थी।  नई ऊर्जा के साथ मैदान में आने को काँग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गाँधी ने यूपी को पूर्वी और पश्चिम उत्तर प्रदेश में बाँटा है। प्रियंका गाँधी के पास पूर्वी उत्तर प्रदेश तथा ज्योतिरादित्य सिंधिया के जिम्मे पश्चिमी उत्तर प्रदेश की कमान है। सूत्रों के अनुसार सिंधिया को पहले बुंदेलखण्ड की चारों लोक सभा सीटों झाँसी, जालौन, बांदा, हमीरपुर का भी कामकाज सम्भालना था। यह करीब -करीब तय हो चुका था। जब सीटों के वितरण पर बुंदेलखण्ड के कांग्रेस कार्यकर्ताओं को सुराग लगा तो वे चिंतित होने लगे । सभी को भाजपा के प्रोपेगन्डा का भय सताने लगा। तब राहुल -प्रियंका को मेल करके इस सम्बन्ध में अपनी आपत्ति जताई गई।

ग्वालियर रियासत के राजा थे ज्योतिरादित्य सिंधिया के पूर्वज


ज्योतिरादित्य सिंधिया के पूर्वज जयाजी राव सिंधिया जो कि 1857 में ग्वालियर रियासत के राजा थे। उन पर उस वक्त अँग्रेजों का साथ देने का दाग लगा था। कालपी में हारने के बाद लक्ष्मीबाई,  रावसाहब, तात्या ,नवाब से अँग्रेजों से लोहा लेने की चर्चा कर रहीं थीं।  इस दौरान रानी ने कहा "अब तक हम लोग जहाँ-जहाँ अँग्रेजों से जमकर लड़ पाये, वहाँ-वहाँ किलों का आश्रय लेकर। फिर किसी मजबूत किले को हाथ में करना चाहिये । ग्वालियर के बारे में पुन: पूरी वस्तु स्थिति पता कर उस पर आक्रमण कर देना चाहिये । राजा और वहाँ के दो तीन सरदार अंग्रेज कंपनी के पक्षपाती हैं, लेकिन पूरी सेना और जनता नहीं। सेना यदि पूरी प्रबलता के साथ हमारा पक्ष नहीं भी पकडेगी तो वह ढुलमुल अवश्य रहेगी"।

अंग्रेजों की तरफ से थी राजा को 10 हजार सैनिक रखने का अनुमति


ग्वालियर में उस वक्त सिन्धिया के 10 हजार की सेना रखने का अधिकार अँग्रेजों ने दे रखा था। अँग्रेजों  की मिलीभगत से अंग्रेजी और मराठी जानने वाले दिनकरराव को ग्वालियर रियासत का रेजिडेंट बनाकर बैठा दिया था। महाराजा के परामर्शदाता के रूप में तैनात दिनकरराव का कामकाज पर पूरा दखल रहता था। बताया जाता है कि दिनकरराव राजबाडे की चालाकी की वजह से नाबालिग जयाजीराव को महाराजा की मान्यता के बदले अँग्रेजों से मोहना में एक सन्धि करनी पड़ी थी। जिसमें सिन्धिया सेना को यद्ध के दौरान अँग्रेजों का साथ देने की शर्त शामिल थी।
जब रानी के नेतृत्व में सेना ग्वालियर आईं थी तो सिन्धिया की सेना ने रानी का साथ दिया था जिससे ग्वालियर पर उनका कब्जा हो गया था । इसके बाद दिनकरराव ने सन्धि का हवाला देकर अँग्रेजों की कब्जे वाली सेना का नेतृत्व करने को विवश कर दिया था। अपने महाराज को सेनापति बना देख सेना ने रानी के लड़ाकों का साथ छोड़ दिया, इससे रानी लक्ष्मीबाई की सेना हार गई । जयाजी राव सिन्धिया की उस वक्त शर्तों की जो भी मजबूरी रही हो पर इतिहास में लिखा यह निष्कर्ष नहीं बदल सकता कि झाँसी की रानी का साथ ग्वालियर के राजा ने नहीं दिया। अपना पद बचाने को उन पर मोह हावी हो गया। यदि सिन्धिया ने रानी का खुलकर साथ दिया होता तो इतिहास कुछ दूसरा ही लिखा जाता।

22 मई 1858 को रानी लक्ष्मी बाई की सेना हार गई


कानपुर ,बिठूर और झाँसी की रक्त रंजित लड़ाई के बाद विद्रोही सेनाएं कालपी होकर ग्वालियर आई तो इन्दौर की सेना भी आगरा तक आ गई थी। तब सिन्धिया को चिठ्ठी भेजकर मदद मांगी गई थी पर दिनकरराव की बिछाई गई बिसात में फँसकर जयाजीराव ऐसा नहीं कर पाये। नतीजतन 22 मई 1858 को विद्रोही सेना हार गई थी और इस हार के लिये इतिहास में जिम्मेदार सिन्धिया बने।  झाँसी सहित आसपास के क्षेत्र में लक्ष्मीबाई का आज भी आदर है। ज्योतिरादित्य का सम्बन्ध उसी ग्वालियर घराने से है।

BJP हाईकमान को भेजी जा चुकी है रानीलक्ष्मी बाई की कविता


इसलिये चुनाव के दौरान 1858 की उस भूमिका का उठने का डर कांग्रेसियों को सता गया। पार्टी कार्यकर्ताओं को यह आशंका सताने लगी कि भाजपा इतिहास को खंगालने में देर नहीं लगाएगी। ऐसे में प्रियंका -सिन्धिया को नई भूमिका मिलने की जो खुशी मनाई जा रही थी ,फिर 1858का लगे दाग को डैमेज कंट्रोल करने में माथा -पच्ची करनी होती । रानी लक्ष्मीबाई की बहादुरी पर लिखी गई कविता -"खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी " की तलाश कर अपने नेतृत्व के पास भेजी जा रही है। उस पंक्ति को अंडर लाइन किया जा रहा है ,जिसमें ग्वालियर के महाराजा की भूमिका पर सवाल उठाये गये थे। उस कविता में लिखी गई लाइन इस प्रकार है- विजयी रानी आगे चल दी ,किया ग्वालियर पर अधिकार । अँग्रेजों के मित्र सिन्धिया ने छोड़ी रजधानी थी।। सूत्रों के अनुसार इतिहास को आधार बनाकर भाजपा कोई नया शिगूफा न छेड़ दे , इससे सावधान होकर फिर प्रियंका गांधी ने यहाँ की चारों सीटों को अपनी लिस्ट में शामिल करने का निर्णय लिया। राहुल गाँधी भी यही चाहते थे ।

[caption id="attachment_18873" align="alignright" width="387"] A Report By Dr.Rakesh Dwivedi (Orai)
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