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  • दिल्ली पुलिस ने छापा डाल तीन को पकड़ा लेकिन माधो नहीं पकड़ा जा सका
  • डरु के पक्ष में गवाह बने टिकरी के तीनों ग्रामीणों को विक्रम ने ने मार दिया था 


Dr.Rakesh Dwivedi

(Orai), Bundelkhand

गिरोह के पास कुरौली में  रामेश्वर नाई के घर लूटपाट में जो सामान मिला था उसके समाप्त होने पर औरैया के नौरी गाँव में डकैती डाली गई। धोखे से विक्रम की गोली से कुसुमा घायल हुई थी। उसका इलाज कराने को माधो के अलावा उसका पिता सुन्दर लाल और बड़ा भाई धर्मजीत दिल्ली गए। उन्हें गाँव की ही कुंजीलाल मल्लाह के बेटे कढ़ोरे ने किराए पर कमरा दिला दिया। इनके साथ कुसुमा को देख उसका माथा ठनका। तब उसने डरु को चिट्ठी लिखकर सारी जानकारी दी थी। इसके बाद ही कुसुमा को पकड़ा गया और उसे जेल जाना पड़ा। जेल से छूटकर कुसुमा नाइन माधो के साथ गिरोह में शामिल हो गई थी।


कुसुमा की कहानी 1978 से 1980 के बीच झूलती है। जेल से छूटने के बाद कुसुमा ने बीहड़ में रहने की जिंदगी कुबूल  कर ली। इटावा जेल जाने से पहले डरु और थानाध्यक्ष ने खूब समझाया पर कुसुमा ने किसी की नहीं सुनी। उसने अपनी आँखों में “मोहब्बत की पट्टी” बाँध रखी थी। फिर तो वह चौखट पर लौटने लायक नहीं बची। बंदूक के साथ वह अपनी कहानियाँ बनाती रही। 24 साल बाद जाकर उसे हथियार रखना ही उचित लगा।

कुसुमा नाइन किशोरावस्था में गाँव के ही जिस माधो मल्लाह के प्रेमजाल में फँस गई थी, उसका पिता सुन्दरलाल और बड़ा भाई धर्मजीत मल्लाह तो  पहले से ही अपराध की दुनिया में थे। सुन्दरलाल के पास उस वक्त यमुना के करमुखा घाट का ठेका था। दिन में वह राहगीरों को नदी पार कराता और रात में डकैतों के गिरोह को नाव पर ढोकर उन्हें किनारे पहुंचाता। कभी-कभी वह विक्रम मल्लाह के साथ डकैती भी डालने चला जाता। 

नौरी में डकैती डालते वक्त जब कुसुमा घायल हुई तो उसे इलाज के लिए सुन्दरलाल, धर्मजीत और माधो दिल्ली ले गए। उस वक्त गाँव के ही कुंजीलाल मल्लाह का लड़का कढ़ोरे श्रीनिवासपुरी में रहकर बिजली का काम करता था। सुन्दरलाल ने उसके पास जाकर रहने की जगह मांगी। कढ़ोरे ने पास में ही किराए पर कमरा दिलाकर एक बिस्किट फैक्ट्री में काम भी दिला दिया।

एक दिन कढ़ोरे उनके कमरे में गया। वहाँ जाकर देखा कि कुसुमा भी इनके साथ में है और पैर में पट्टी बाँध रक्खी है। तब कढ़ोरे ने पूछा, कि तुम्हारे पैर में क्या हो गया है...? कुसुमा बोली, पैर में विषैला फोड़ा हो गया था। घर पर ठीक न हुआ तो पिताजी ने सुन्दर चाचा के साथ इलाज के लिए यहाँ भेज दिया। अब यहाँ आराम मिला है। कुसुमा असली बात छिपा गई। कुसुमा का जवाब सुनकर कढ़ोरे अपने कमरे चला आया। अब उसके मन में उथल-पुथल मचने लगी। 

उसके मन में प्रश्न उभरा कि सुन्दर तो मेरी जाति के हैं। उस पर पिता-पुत्र सब के सब अपराधी प्रवृत्ति के हैं। इनके साथ डरु चाचा ने अपनी जवान बेटी कैसे अकेले भेज दी...? जबकि उसका जाति-बिरादरी का भी कोई संबंध नहीं है। जब मन परेशान हुआ तो उसने एक दिन डरु को चिट्ठी लिखकर पोस्ट कर दी। पत्र में कुसुमा कहाँ है...? किसके साथ है और कहाँ रह रही है...? सब बातों का जिक्र कर दिया। डरु को पत्र मिला। खुद न पढ़ पाने पर दूसरे से पढ़वाया। वही पत्र लेकर थाने गया। कोई मदद न मिली तो पत्नी से 500 रुपए लेकर दिल्ली पहुंचा। कई लोगों से पता पूछते-पूछते वहाँ भी पहुंचा, जहां सुन्दर लाल रह रहा था।

डरु ने मुंह पर साफी लपेटकर उस गली में घुस गया। आगे जाकर देखा कि कुसुमा बाहर नाली के किनारे बैठकर बर्तन धुल रही है। कुसुमा अपने पिता को नहीं पहचान पाई। उसे यहाँ तक आने का अंदाजा भी नहीं था। इसके बाद डरु ने पुलिस को बताया। थाना पुलिस ने धावा बोलकर कुसुमा, सुन्दर लाल और धर्मजीत को हिरासत  में लेकर थाने ले आई। माधो नहीं मिला। वह कमरे के बाहर था।  पुलिस ने कुसुमा से अपने पिता के साथ जाने को कहा लेकिन वह नहीं मानी। उसे नारी निकेतन भेज दिया गया। यह मामला मार्च 1980 का है।

दिल्ली पुलिस की सूचना पर बाद में औरैया पुलिस पहुँची। दोनों आरोपी पहले से कई मामलों में वांछित थे। कुसुमा को फिर समझाया गया। जिद पर अड़ी कुसुमा फिर भी नहीं मानी। तब कुसुमा सहित तीनों को इटावा जेल भेज दिया गया।

अब माधो को भनक लगी। वह सीधे विक्रम के पास पहुंचा। सारी घटना सुनकर विक्रम को भी क्रोध आया। उसने डरु को सबक सिखाने का निश्चय किया। मई 1980 में विक्रम ने गिरोह के साथ जाकर डरु और पत्नी साथ मारपीट कर डकैती डाली। पाल सरैनी के मल्लाहों से कहकर विक्रम ने कुसुमा सहित तीनों की जमानत इटावा से करवा ली। तीनों छूटकर सीधे पहले गोहनी पहुंचे और फिर यहीं से विक्रम के साथ श्रीराम-लालाराम गिरोह में जाकर शामिल हो गए। तब गिरोह में फूलन देवी भी थी।

जिन लोगों ने डरु के पक्ष में गवाही दी थी उन्हें विक्रम और उसके साथियों ने मारना शुरू कर दिया। पहले अशरफी, फिर जगमोहन और अंत में नेकसे मल्लाह को मार दिया गया। इसके बाद भयभीत होकर डरु और सावित्री ने जून 1980 में टिकरी से पलायन करने को मजबूर हुए।

  • गिरोह का सरदार बनने की चाहत में विक्रम ने मल्लाह साथियों के साथ बनाई थी योजना
  • कुसुमा ने साजिश उजागर की तो श्रीराम-लालाराम ने विक्रम और उसके मामा को मार डाला
  • बुधवार को कुसुमा नाइन का त्रयोदशी कार्यक्रम ससुराल में संपन्न


Dr. Rakesh Dwivedi

(Orai), Bundelkhand

ससुराल में तो दस्यु सुंदरी  कुसुमा नाइन बहू बनकर नहीं रह पाई थी पर उसका अगला जन्म सुधारने की कल्पना में धार्मिक परम्पराओं का पालन उसके पति की तरफ से फिर भी किया गया। बेहद क्रूर रही कुसुमा की बीहड़ कहानी कई हिस्सों में बंटी रही। केदार उर्फ रूठे से विवाह के बाद बीहड़ों में वह तीन डकैतों की प्रेमिका बनकर रही। फूलन देवी के आपराधिक जीवन की उम्र पांच वर्ष तो कुसुमा का 24 वर्ष तक रहा। प्रेम, भय और अपराध की इस कहानी में चर्चा उस साजिश की है, जिसमें विक्रम मल्लाह ने दोनों भाइयों-श्रीराम-लालाराम को मार देना चाहता था पर उस साजिश का शिकार बाद में वह खुद ही हो गया। उस दिन उसकी प्रेमिका फूलन देवी भी रक्षा नहीं कर पाई थी। अपनी ससुराल बैजामऊ के पास उस रात विक्रम और उसके मामा बारेलाल मल्लाह दोनों को मार डाला गया था।

 

चम्बल-यमुना के बीहड़ों के कटाव और घुमावदार बीहड़ और वहाँ की कटीली झाडियों में सिर्फ डकैत ही नहीं छुपते थे, उनमें साजिशें भी छुपा करती थीं। श्रीराम-लालाराम दोनों सगे भाई थे जो जाति के ठाकुर थे। बाबू गुर्जर की हत्या के बाद इस गिरोह का सरदार श्रीराम था। पहले फूलन देवी फिर कुसुमा नाइन भी इस गिरोह का हिस्सा बनी। मतलब श्रीराम-लालाराम और कुसुमा नाइन को छोड़कर सभी सदस्य मल्लाह जाति के ही थे। यही बात विक्रम मल्लाह को अखरती रहती थी। जब भी दोनों भाई कहीं चले जाते तो मौका पाकर विक्रम अपनी बिरादरी के सदस्यों में विरोध की चिंगारी भड़काता रहता। वह कहता कि गिरोह में सभी सदस्य मल्लाह जाति के हैं और गिरोह ये ठाकुर भाई मिलकर चलाते हैं। जबकि गिरोह उसके नाम से चलना चाहिए। विक्रम बहुत तेज दिमाग, शातिर और दुस्साहसी था। बीहड़ों में जातिवार की आग सबसे पहले उसके द्वारा ही भड़काई गई थी जिसके बाद बेहमई, अस्ता और रोमई  जैसे काण्ड सामने आये। इसके बाद से डकैतों को संरक्षण भी जातियों के आधार पर मिलने लगा।

यह साजिश पहली और बड़ी थी। इसकी पटकथा भी विक्रम ने मजबूती से तैयार की थी। यदि कुसुमा रणनीति के आधार पर चल पड़ती तो श्रीराम-लालाराम की जिंदगी पहले ही खत्म हो सकती थी। साजिश का एक हिस्सा कमजोर साबित होने से दांव उल्टा पड़ गया।


एक दिन श्रीराम और लालाराम अपने गाँव भाल गए हुए थे। तब विक्रम ने साफ-साफ कहा कि-अब ठाकुरों को गिरोह के मुखिया के रूप में बर्दाश्त नहीं करूंगा। मैंने योजना बनाई है कि माधो अपनी प्रेमिका कुसुमा को श्रीराम के हाथों सौंप दे। कुसुमा पहले उनका दिल जीते और अपनी बातों में फँसाये। फिर उन्हें एक दिन दारु पिलाये। नशा ज्यादा चढ़ने पर जब वे होश खो बैठें तो दोनों को मैं गोली मार दूंगा और गैंग का संचालन करूंगा।

माधो भी कुसुमा को श्रीराम को देने पर सहमत हो गया। गाँव से श्रीराम-लालाराम वापस आये। माधो ने उनके समक्ष जाकर बात रखी। प्रस्ताव से दोनों भाई खुश हुए। अब कुसुमा श्रीराम की हो गई और प्रेमिका बनकर रहने लगी। लालाराम भी उसे भौजी कहने लगा। प्यार और सम्मान पाकर कुसुमा नाइन का मन बदलने लगा। उसने एक दिन दोनों भाइयों को विक्रम और माधो की साजिश के बारे सब कुछ बता दिया। अब श्रीराम विक्रम को निपटाने की योजना में जुट गया। इसमें लालाराम और कुसुमा को भी साथ मिलाया। 

 

एक दिन श्रीराम ने विक्रम से बैजामऊ किसी काम से चलने के लिए राजी किया। यह बात 1980 की है। बैजामऊ विक्रम की ससुराल थी। तब छह लोग गिरोह से बैजामऊ के लिए चल पड़े। विक्रम के साथ उसका मामा बारेलाल और फूलन देवी तथा श्रीराम, कुसुमा और लालाराम। सभी के पास रायफल थी। गाँव करीब आया तो श्रीराम ने विक्रम को यह कहते हुए रोक दिया कि थोड़ी देर में ही मैं आता हूँ, तब तक तुम लोग यही पर रुको। यदि कोई खतरा हुआ तो फायरिंग कर दूंगा, तुम लोग दौड़ कर आ जाना। बरगद का पेड़ था। तीनों लोग श्रीराम के लौटने का वहीं इंतजार करने लगे। रात के 12 बजे रहे थे। विक्रम और बारेलाल को नींद आ गई। सुरक्षा के लिए फूलन देवी रायफल के साथ पहरा देने लगी।

करीब आधा किमी. चलने के बाद श्रीराम, कुसुमा और लालाराम झाडियों की आड़ में बैठकर योजना बनाने लगे कि आज विक्रम को कैसे मारा जाए?  करीब डेढ़ घंटे बाद तीनों वहीं लौटे जहां विक्रम को छोड़कर गए थे। दोनों लोगों को सोता हुआ पाकर कुसुमा ने सबसे पहले फूलन को रायफल सहित दबोच लिया। इसके बाद गहरी नींद में सो रहे विक्रम को श्रीराम ने और बारेलाल को लालाराम ने गोलियाँ मार दी। अब अकेले बची फूलन से उसकी रायफल छीनकर उसे बेहमई भेज दिया गया। विक्रम की मौत ठौर पर मौत हुई या बाद में इसको लेकर मतभेद है। एक जानकार का कहना है कि विक्रम का इलाज दिबियापुर में कराया गया था, लेकिन वह बच नहीं पाया।

 

दोनों को गोलियाँ मारने के बाद श्रीराम-लालाराम गिरोह में लौटे। गिरोह के सदस्यों को जब पता चला कि विक्रम व बारेलाल को गोली मार दी गई है और फूलनदेवी को कहीं गायब कर दिया गया है तो मल्लाह सदस्यों में असंतोष की ज्वाला फूट पड़ी। उसी वक्त सभी मल्लाह गिरोह से अलग होकर अपना अलग गिरोह बना और मान सिंह को अपना सरदार चुन लिया। कुछ समय बाद जब फूलन किसी तरह गिरोह तक पहुँची तो गिरोह को नई ताकत के साथ तैयार कर विक्रम की मौत का बदला बेहमई काण्ड के रूप में लिया। इसके बाद बदले की भावना में अस्ता और रोमई काण्ड भी हुए।

 

बैंडिट क्वीन से सांसद बनने तक के फूलन देवी के सफर में नाग पंचमी की खास भूमिका है। इस रहस्य से आज पर्दा खुल रहा है। आज नागपंचमी है । इस त्योहार का खास हस्तक्षेप   फूलन के जीवन में रहा है। फूलन देवी नागपंचमी के दिन ही बीहड़ों में हथियार लेकर कूदी थीं....

 

80 के दशक में पुलिस के सामने सरेंडर के दौरान दस्यु सुंदरी फूलन देवी अपने गिरोह के साथ

Dr. Rakesh Dwivedi

Uttar Pradesh के जालौन जिले की कालपी तहसील के तहत एक गांव है शेखपुर गुढ़ा। यमुना नदी किनारे बसे यह गांव में निषाद जाति बाहुल्य है। उस दौर में यह  क्षेत्र शिक्षा, चिकित्सा , आवागमन और कानून व्यवस्था की मूलभूत समस्याओं से जूझ रहा था, वहीं फूलन देवी के परिवार के सामने एक अलग किस्म की समस्या थी और वह थी “पारिवारिक विश्वास” की। फूलन का संघर्ष सबसे पहले खुद के खानदान से Start हुआ था। जमीन के विवाद में वह बीहड़ों तक पहुंच गई।

आरोप है कि खानदानी विवाद के चलते फूलन देवी के ताऊ के लड़के मइयादीन ने अपने घर डकैती डलवाकर उसमें फूलन को नामजद कराया था। यह तारीख थी 26 दिसंबर 1978, फूलन को उरई जेल में रहना पड़ा। आम चर्चा है कि फूलन देवी को अपहरण कर ले जाया गया था। जबकि इसमें सत्ययता नहीं मानी गई। फूलन के लिए विक्रम मल्लाह कोई अनजान नहीं था। वह मइयादीन का ममेरा भाई था। उसका गांव  में आना- जाना था। जेल जाने का बदला फूलन देवी हर कीमत पर लेना चाहती थी।

29 जुलाई 1979 रविवार को वह घर छोड़कर बीहड़ चली गई। उस दिन नाग पंचमी थी। इसके बाद फूलन की एक नई कहानी Start हुई। बेहमई कांड से सांसद बनने के उनके किस्से दर किस्से चर्चा में रहे। 25 जुलाई को सांसद रहते हुए नई दिल्ली में जब उनकी हत्या हुई उस दिन भी नाग पंचमी ही थी। गोली से Start हुई “कहानी” गोली से ही खत्म हुई।

 


जमीन का क्या है विवाद....???

शेखपुर गुढ़ा में इस परिवार के पास 60 बीघा जमीन थी। जिस पर अब मालिकाना हक मइयादीन के पास है। फूलन से विवाद का असली कारण यही बना था। यह परिवार मनफूल निषाद से शुरू हुआ। मनफूल के दो बेटे थे- किशोर निषाद और गुमान निषाद। अब किशोर निषाद के तीन लड़के हुए बिहारी निषाद( मइयादीन के पिता), देवीदीन निषाद ( फूलन देवी के पिता) और रामदीन निषाद। जब कि गुमान के दो पुत्र थे, गुरुदयाल और भवानीदीन।

जब पीढ़ियां बदली तो भूमि का वारिसाना हक भी बदलना Start हुआ। उक्त जमीन सर्वप्रथम किशोर निषाद के आधिपत्य में रही थी। उनके निधन के बाद उनके बड़े बेटे बिहारी निषाद के नाम आ गई। बिहारी परिवार में सबसे बड़े थे लिहाजा सरकारी कागजों में उनके नाम जमीन दर्ज हो गई। अब बिहारी, देवीदीन और रामदीन में से कोई जीवित नहीं है। बिहारी के पुत्र मइयादीन , रामदीन के शिवनारायण सहित फूलन व अन्य बेटियां तथा रामदीन के कोई सन्तान नहीं थी। इसलिए पारिवारिक जमीन  का विवाद मइयादीन और फूलन देवी के परिवार के बीच शुरू हुआ। इसी की परिणति रही कि फूलनदेवी को बंदूक उठानी पड़ी।

 


 

मइयादीन का जब जमीन पर कब्जा हुआ तो मुकदमा दर्ज कराया गया। यह मुकदमा  इंद्रजीत और देवीदीन की ओर से इस आशय के साथ लिखाया गया कि पैतृक भूमि पर उन्हें न्याय दिलाया जाए। मुकदमेबाजी के बाद गांव में एक पंचायत हुई थी। पंचायत में शामिल पंचों ने परिवार के बीच रजामंदी कराई । उस वक्त परिवार वाले राजी होकर अलग- अलग हिस्सों में जमीन जोतने लगे। डकैत बनने के बाद फूलन ने उक्त जमीन मइयादीन से खींच ली थी। लेकिन उनकी हत्या के बाद फिर से मइयादीन का कब्जा हो गया। शेखपुर मौजा में जो साढ़े पांच बीघा जमीन है वह फूलन के भाई शिवनारायण के नाम दर्ज है। यह जमीन मंगरौल मौजे से अलग है। नदी किनारे की यह जमीन कम उपजाऊ और उबड़-खाबड़ है। 

फूलन देवी के भाई शिव नारायण

 

60 बीघा जमीन पर आधा मालिकाना हक इंद्रजीत मांगा था। पंचायत की रजामंदी के आधार पर जमीन जोती जाने लगी। वहीं बाकी बची 30 बीघा जमीन पर फूलनदेवी ने अपना हिस्सा मांगा, जिसे बिहारी और मइयादीन ने नहीं देना चाहा था। फूलन का मइयादीन से विवाद का मुख्य कारण यह जमीन ही थी।

 

फूलन को खटकती रही 15 बीघा जमीन

साढ़े पांच बीघा जमीन शेखपुर गुढ़ा मौजे में भले ही शिवनारायण ( फूलन के भाई) के नाम पर थी पर फूलनदेवी और उसकी मां मुला देवी की आंखों में मंगरौल मौजे की 15 बीघा खेती का हक खटकता रहा। अपने हिस्से की जमीन को लेकर मुलादेवी अक्सर मुद्दा उठाती रही पर उसे यह नहीं पता कि सारी जमीन पर अभी तक मालिकाना हक मइयादीन के नाम पर है।

 

 

 

  • पति, देवर और बेटे की मौत के बाद सामने नहीं आई Shaista 
  • Shaista को लेकर Social Media पर तमाम तरह की खबरें Viral
  • पुलिस ने Shaista के सिर पर घोषित कर रक्खा है 50 हजार का इनाम
  • सिपाही की बेटी शाइस्ता ने वर्ष 1996 में अतीक अहमद से किया था निकाह
  • प्रयागराज के मडियाडीह के पास मिल रही है Shaista की लोकेशन


Yogesh Tripathi

पति, देवर और बेटे की मौत के बाद Shaista Parveen का परिदृश्य से “अंडरग्राउंड” होना तमाम तरह की शंका पैदा कर रहा है। Shaista Parveen को लेकर Social Media पर तरह-तरह की खबरें Viral हो रही हैं। पुलिस वाले की बेटी से Most Wanted लेडी का सफर तय कर चुकी Shaista के सिर पर 50 हजार रुपए का इनाम घोषित है। “यक्ष प्रश्न” ये है कि क्या Shaista बागी तेवर दिखाने का हौसला अख्तियार करेगी या फिर सरेंडर कर जेल जाएगी...? दरअसल Shaista के सामने अब दो ही रास्ते बचे हैं। पहला कि वह कानून के सामने सरेंडर कर जेल जाए और दूसरा यह कि वह पति अतीक, देवर अशरफ और बेटे असद की मौत के बाद खौफ व जरायम की दुनिया के दलदल में धंसती जाये। Shaista के पास अतीक और उसके गिरोह तमाम गहरे राज भी हैं जो सिर्फ उसे ही पता हैं।


चूंकि Shaista शब्द की उत्पत्ति पश्तो शब्द से हुई है। जिसका अभिप्राय सुंदरता,विनम्रता, शिष्टता और जहीनियत से है। इसे भाग्य कहें या फिर जीवन की परिस्थितियां... ग्रेजुएट तक पढ़ाई करने वाली Shaista ने वर्ष 1996 में हाईस्कूल तक पढ़े माफिया डान अतीक अहमद से निकाह किया। इसके बाद अतीक की बेगम Shaista को एक बहुत ही अलग व्यक्त्तिव में बदलना पड़ा। Shaista चूंकि कुंभ राशि होती है। इस राशि के जातक अधिकांशतः बहुत जिद्दी एवं योजना बनाने में प्रवीण एवं निपुण होते हैं। साथ ही जल्दी अपने मन की बातें किसी से शेयर नहीं करते हैं। शायद यही वजह है कि Shaista और उसके प्लान के बारे में STF को भनक तक नहीं लगी है। हाल अब ये है कि शाइस्ता की खोजबीन आसमान से भी का जा रही है। बुधवार को कौशांबी में ड्रोन की मदद से Shaista की निगाहबनी की जाती रही।

 

STF और प्रयागराज पुलिस की करीब दर्जन भर टीमें Shaista की तलाश में हर-गली और मोहल्ले में खाक छान रही है। उसकी लोकेशन प्रयागराज के मरियाडीह के आसपास मिल रही है। हालांकि तमाम Media Report’s और Social Media में यह दावा किया जा रहा है कि Shaista और Guddu Muslim गिरफ्त में हैं। तमाम Viral खबरों में Guddu Muslim को गद्दार बताते हुए असद और गुलाम के Encounter उसका हाथ होना भी बताया जा रहा है। गुड्डू की लोकेशन कर्नाटक में मिली है। चर्चा उसके पकड़े जान की भी लगातार हो रही है। Godi Media के कुछ Channel तो Shaista और Guddu Muslim को लेकर मनगढ़ंत “कहानियां” बना रहे हैं। इन कहानियों में उसके चरित्र तक पर अंगुली उठाई जा रही है।


सोशल मीडिया की तमाम साइट पर Shaista को हजारों करोड़ रुपए के कारोबार की मालकिन भी बताया जा रहा है। मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो हरियाणा में कई कंपनियां उसके नाम पर हैं। जिसके जरिए करोड़ों रुपए की आय शाइस्ता को होती है। इतना ही नहीं कुछ चैनलों का तो यहां तक दावा है कि अतीक अहमद और अशरफ के जेल जाने के बाद Shaista अपने बेटे असद के सहयोग से गिरोह के तमाम कारोबार को खुद ही संभाल रही थी। इसमें कारोबारियों से अवैध उगाही तक भी शामिल है।


सिपाही की बेटी Shaista का बचपना और जवानी थानों की चहारदीवारी में ही बीती है। लंबे समय तक वह पिता और परिजनों के साथ पुलिस विभाग के सरकारी मकान में रही है। पुलिस के हर खेल से वह वाकिफ है। शायद यही वजह है कि लंबा जाल बिछाने के बाद भी Shaista पुलिस STF की गिरफ्त से दूर है। आशंका ये भी जाहिर की जा रही है कि यदि वह पकड़ में नहीं है तो वह गिरोह को मजबूती प्रदान कर रही होगी। चर्चाएं इस बात की भी है कि अतीक, अशरफ और असद की मौत के बाद गिरोह का की लगाम किसके हाथ में होगी...? कौन होगा गिरोह का “सरदार”...? क्या पुलिस सरकारी अभिलेखों में Shaista को गैंग लीडर घोषित करेगी... या फिर गिरोह के बचे और शूटर्स को खत्म कर पुलिस अतीक नाम की file को ही हमेशा के लिए बंद कर देगी।


 एक खबर ये भी है कि अपने बचाव और अंडरग्राउंड रहने के लिए Shaista अंडरवर्ल्ड के कनेक्शन का भी इस्तेमाल कर रही है। यदि ऐसा है तो ये एक और गंभीर मामला है। ऐसे में देश की खुफिया एजेंसियां और भारत सरकार का गृह मंत्रालय क्या कर रहा है...? WhatsApp University और Facebook पर ट्रोल आर्मी की पोस्ट को तमाम यू-ट्यूबर और पोर्टल का संचालन करने वाले मूर्धन्य पत्रकार खबर बनाकर न सिर्फ Likes & Views बटोर रहे हैं बल्कि आम जनता को सही खबरों और मुद्दों से भी भटकाने का कार्य पूरी तन्मयता से कर रहे हैं। सच्चाई ये है कि सभी एक एजेंडे के तहत कार्य कर रहे हैं।


डेढ़ दर्जन पुलिस कर्मियों और दर्जन भर से अधिक मीडिया कर्मियों की मौजूदगी में पुलिस कस्टडी के दौरान अतीक और अशरफ का Live Shoot Out होता है लेकिन इस सनसनीखेज कांड पर चर्चा और बहस तक नहीं हो रही है। कि आखिर झोपड़ी में रहने वाले गली के लोफरों के पास 10 लाख रुपए के कीमत की विदेशी जिगाना पिस्टल कहां से आई...? कौन है वो मॉस्टर माइंड जिसने ये पिस्टलें हत्यारों को मुहैया कराईं...? Shoot Out के बाद धार्मिक नारा लगाने का मकसद क्या था...? तीनों के पास से मोबाइल फोन तक बरामद नहीं हुए हैं फिर उनको अतीक-अशरफ की लोकेशन किसने और कैसे दी...?


हत्यारों के मुताबिक तीनों ने एक दिन पहले रेकी की थी जबकि अस्पताल के चिकित्सकों का कहना है कि उन लोगों को अतीक-अशरफ के लाए जाने की खबर तक नहीं थी...अस्पताल के अंदर जब पार्किंग की व्यवस्था थी तो पुलिस की जीप को अस्पताल के गेट पर रोकने के बाद दोनों माफिया ब्रदर्स को पैदल अंदर क्यों ले जाया गया...? दोनों को एक हथकड़ी में क्यों बांधा गया...? सबसे बड़ा “यक्ष प्रश्न” ये है कि असलहों की बरामदगी के लिए जब अतीक-अशरफ को ले जाया गया तो उसका Live क्यों किया गया...? सवाल अब ये है कि क्या आगे भी पुलिस रिमांड पर लिए गए अपराधियों से आला कत्ल की बरामदगी के लिए Live करेगी या फिर Photo Shoot कर वीडियो बनवाएगी या फिर पूर्व में किसी अपराधी के साथ ऐसा किया गया...? ऐसे तमाम संवेदनशील जवाब हैं जिसका सीधा जवाब देने से सभी जिम्मेदार किनारा कर रहे हैं।

 

Note…उक्त खबर Social Media पर Viral तमाम खबरों और पोस्टों के आधार पर लिखी गई है....लेखक या फिर पोर्टल की इसमें कोई व्यक्ति राय या फिर टिप्पणी नहीं है...