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  • पीड़ित छात्रा ने पुलिस कमिश्नर (CP) से लगाई गुहार
  • पुलिस कमिश्नर के आदेश पर नवाबगंज थाने में FIR
  • IPC की धारा 354-A के तहत पुलिस ने दर्ज की रिपोर्ट
 

Yogesh Tripathi

Uttar Pradesh के Kanpur स्थित STEP-HBTI इंजीनियरिंग कॉलेज की MBA (1st Year) Student ने संस्थान के असिस्टेंट प्रोफेसर पर Online Class के दौरान अश्लीलता करने का आरोप लगाया है। छात्रा ने कई और आरोप भी लगाए हैं। पीड़ित छात्रा का आरोप है कि उसने मामले की शिकायत प्रिंसिपल समेत कई जिम्मेदार लोगों से की थी लेकिन किसी ने सुध नहीं ली। छात्रा ने इंसाफ के लिए कानपुर के पुलिस कमिश्नर (CP) असीम अरुण से गुहार लगाई। पुलिस आयुक्त के निर्देश पर नवाबगंज पुलिस ने असिस्टेंट प्रोफेसर Dr. Sanjeev Mishra के खिलाफ IPC की धारा 354-A के तहत FIR रजिस्टर्ड की। 

गुरु-शिष्य के रिश्ते को "लोप" कर देने वाली यह वारदात हरकोर्ट बटल यूनिवर्सिटी (HBTI) और AKTU से संबंद्ध (STEP-HBTI) संस्थान की है। यहां पर MBA (1st Year) में अध्यनरत एक स्टूडेंट ने असिस्टेंट प्रोफेसर संजीव मिश्रा पर अश्लील इशारा करने का आरोप लगाया। छात्रा का आरोप है कि संजीव मिश्रा उसे बेवजह वीडियो कॉल कर फोन पर अश्लीलता करते हैं। छात्रा का आरोप है कि संजीव मिश्रा ने उसे अपने केबिन में बुलाकर प्राइवेट पार्ट से गलत इशारा भी किया। पुलिस को दी गई तहरीर में छात्रा ने कई और आरोप भी लगाए हैं।

पीड़ित छात्रा का कहना है कि पहले उसने असिस्टेंट प्रोफेसर की हरकतों को नजरअंदाज किया लेकिन जब पानी सिर से ऊपर चला गया तो उसने प्रिंसिपल समेत कई जिम्मेदार लोगों से शिकायत की लेकिन किसी ने शिकायत पर कार्रवाई नहीं की। छात्रा का कहना है कि तनाव की वजह से उसकी पढ़ाई खराब हुई। यहां तक की कि तनाव की वजह से उसका एक्सीडेंट तक हो गया। असिस्टेंट प्रोफेसर की हरकतों में इसके बाद भी जब कोई सुधार नहीं आया तो छात्रा ने पुलिस कमिश्नर असीम अरुण से शिकायत की।       

पीड़ित छात्रा का कहना है कि असिस्टेंट प्रोफेसर के अश्लीलता का शिकार होने वाली वह कोई पहली छात्रा नहीं है। आरोप है कि इससे पहले भी संजीव मिश्रा कई सीनियर स्टूडेंट्स के इस तरह की हरकतें कर चुके हैं। छात्रा का आरोप है कि एक टीचर भी उनके अश्लीलता का शिकार हो चुकी है। छात्रा का कहना है कि प्रिंसिपल समेत सभी जिम्मेदार लोगों को संजीव मिश्रा के करतूतों की जानकारी है लेकिन कोई उनके खिलाफ मुंह नहीं खोलता है।  

छात्रा का कहना है कि 9 जुलाई को AKTU के VC से ऑनलाइन और स्पीड पोस्ट के जरिए शिकायत की थी। सभी सबूतों को ऑनलाइन शिकायत में attach कर भेजा गया था लेकिन संस्थान के जिम्मेदार लोगों ने कोई कार्रवाई नहीं की। जिसके बाद उसने कानपुर के पुलिस आयुक्त असीम अरुण से शिकायत की। पुलिस कमिश्नर के आदेश पर नवाबगंज पुलिस ने रिपोर्ट दर्ज की। www.redeyestimes.com (News Portal) से बातचीत में नवाबगंज (SHO) ने कहा कि पीड़िता की तहरीर पर IPC की धारा 354-A के तहत मुकदमा पंजीकृत किया गया है। मामले की विवेचना की जा रही है। गुण-दोष के आधार पर जांच कर आवश्यक कार्रवाई की जाएगी।

 


Saurabh Bajpai

Assistant Professsor 

(Delhi University)

यह कायान्तरण (Metamorphosis) क्यों ज़रूरी है ? क्यों कि हर राजनीतिक विचारधारा एक अलग ईकोसिस्टम (पारिस्थितिकी तंत्र) का निर्माण करती है। एक ईकोसिस्टम में पले-बढ़े व्यक्ति को दूसरे ईकोसिस्टम में बहुत “एडजस्ट” करना पड़ता है।

 

एडजस्ट करना यानी अनुकूलन एक बहुत जटिल और लम्बी प्रक्रिया है। क्योंकि विचारधारात्मक रूढ़ियों को तोड़ने के लिए उतने ही मजबूत विचार की जरूरत होती है। रेडिकल लेफ़्ट या रेडिकल राईट की विचारधारा में रचे-बसे किसी व्यक्ति के लिए तथाकथित रूप से “सेंटर” की राजनीति में एडजस्ट करना वाकई एक बड़ी जटिल और लम्बी प्रक्रिया है।

 

मिसाल के तौर पर रेडिकल कम्युनिस्ट पार्टियाँ एक सशस्त्र क्रान्ति का सपना देखता है। हथियारों के बल पर अपने वर्ग-शत्रुओं का सफ़ाया उसकी राजनीतिक पद्धति है। दुनिया के अन्य समाजों में यह वाज़िब भी हो सकती है।

 

लेकिन भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में इस सपने ने समाजवाद की संभावनाओं को बहुत नुकसान पहुंचाया है। तेलंगाना से लेकर नक्सलबाड़ी और आज की माओवादी हिंसा तक— सशस्त्र क्रान्ति का यह सपना ही भारत में वामपंथ के भीतर धुर वामपंथ के पनपने की जड़ है।

 

सशस्त्र क्रान्ति के सपने से आयी यह हिंसा धुर कम्युनिस्ट पार्टियों की सोच में बहुत अंतर्भूत (इन्ट्रीसिक) है। एक शोषणमुक्त दुनिया बनाने के पवित्र उद्देश्य से विचार में पनपी यह हिंसा एक लंबे अंतराल में व्यक्तिव के भीतर बहुत गहरे समा जाती है। अपने बीच से “हेरेटिक” और “रेनेगेड” यानी प्रतिक्रान्तिकारी वर्ग-शत्रुओं को ख़ोजकर उन्हें पार्टी में किनारे लगाना एक क्रांतिकारी कार्यभार मान लिया जाता है।

 

चूँकि यह काम पार्टी से जुड़ा हर व्यक्ति करता रहता है, सभी एक-दूसरे के प्रति गहन संदेह से भरे रहते हैं। इस संदेह को एक-दूसरे के प्रति साजिश में बदलते देर नहीं लगती। यह एक बेहद असुरक्षित मानसिकता का निर्माण करता है और कालान्तर में धुर वामपंथ का स्थायी असुरक्षाबोध बन गया।

 

गाँधी की राजनीति के विपरीत इस रणनीति में मुश्किल पड़ने पर झूठ बोलना भी स्वीकृत है। लोकमान्य तिलक, गाँधी आदि कांग्रेस नेताओं से प्रभावित कम्युनिस्ट नेता श्रीपाद अमृत डांगे मेरठ कांस्पीरेसी केस (1929) में शामिल थे।

 

पकड़े जाने पर उनके अधिकतर साथियों ने तय किया कि जब उनसे पूछा जाएगा। “क्या तुम कम्युनिस्ट हो”, वो चुप रहेंगे और ब्रिटिश कम्युनिस्ट पार्टी से भेजे गए डिफेन्स अटॉर्नी की सलाह का इंतज़ार करेंगे। लेकिन डांगे ने कहा कि वो स्वीकार करेंगे कि “हाँ मैं (कम्युनिस्ट) हूँ” क्योंकि कांग्रेस के कार्यकर्ता पकड़े जाने पर झूठ नहीं बोलते बल्कि सच बोलकर शान से जेल जाते हैं।

 

डांगे उलाहना देते हुए कहते हैं कि यह एक “ब्लडी रेवोल्युशनरी पार्टी” थी जिसका दावा था कि वो क्रान्ति करने जा रही है। इस पर डांगे को पार्टी अनुशासन तोड़ने के अपराध में एक साल का बायकाट झेलना पडा। एक ही अपराध में झूठ बोलने वालों को महज़ एक साल की और सच बोलने वाले डांगे को तीन साल की सजा सुनाई जाती है।

 

यह मिसाल यह बताने के लिए काफ़ी है कि कांग्रेस और कम्युनिस्ट तौर-तरीक़ों में ज़मीन-आसमान का फ़र्क रहा है। यही वो गहरी परंपरा है जिसमें दोनों का भिन्न-भिन्न ईकोसिस्टम विकसित होता है।

 

इसलिए यह पूछना लाज़मी है कि क्या CPI (ML) लिबरेशन से आये लोगों ने रेडिकल वामपंथी ईकोसिस्टम में जो लर्न किया था, उसे अनलर्न कर दिया है ? अगर नहीं किया है तो क्या उनके पुराने ईकोसिस्टम के तौर-तरीक़ों को Congress में जमाने के लिए पुराने बरगद गिराए जायेंगे ? 

 

Note---ये लेखक के निजी विचार हैं।

 

 


Saurabh Bajpai

Assistant Professsor 

(Delhi University)

कई प्रभाव अक्सर अनजाने और अनायास आते  हैं। Uttar Pradesh (Congress) के ऊपर धुर कम्युनिज्म का यह प्रभाव भी संभवतः अनजाना और अनायास है। अनजाना इसलिए कि शायद इसकी प्रामाणिक ख़बर कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व तक पहुँचने नहीं दी जाती है, या फिर पहुँचने पर उसकी भ्रामक व्याख्या कर दी जाती है।

 

अनायास इस लिए कि भले ही ऐसा करना किसी का सायास उद्देश्य न हो, लेकिन बेहद यांत्रिक तरीके से यह होता चला जा रहा है। हो सकता है कि Uttar Pradesh (Congress) में यह हस्तक्षेप एक सुषुप्त संगठन में फ़ौरी तौर पर कुछ हरकत पैदा करे, आख़िरकार यह आत्मघाती सिद्ध होगा। जिस संगठन को लंबे समय तक पोषण और उपचार की जरूरत है, स्टेरॉयड देकर उसके शरीर को कृत्रिम रूप से फुलाना ख़तरे से ख़ाली नहीं है।

 

कम्युनिस्ट पार्टियों से कांग्रेस में आये तमाम युवाओं का स्वागत करना चाहिए। लेकिन कांग्रेस सौरमंडल (पिछली पोस्ट में वर्णित) में उन्हें एक “निश्चित समय” तक किसी पेरिफ़ेरी (परिधि) पर ही रखना चाहिए था। यह “निश्चित समय”  दरअसल एक मेटामॉर्फ़ोसिस या कायापलट की प्रक्रिया है जिसमें कोई भी नए संगठन की ज़रूरत के हिसाब से ख़ुद की कंडीशनिंग करता है।

 

जिन लोगों को कम्युनिस्ट पार्टियों के डेमोक्रेटिक सेंट्रलिज्म का अंदाज़ा है, वो जानते हैं कि इसने ख़ुद कम्युनिस्ट पार्टियों का कितना नुकसान किया है। इस तरह की तमाम अन्य प्रवृत्तियाँ कांग्रेस में आने वाले लोगों में अगर बची रह गयी हो तो कांग्रेस संगठन का भी बेड़ाग़र्क कर सकती हैं।  

 

स्वाभाविक रूप से एक ख़ास किस्म की राजनीतिक ट्रेनिंग आपका समूचा व्यक्तिव गढ़ती है। इसका प्रभाव कैडर की राजनीतिक विचारधारा पर ही नहीं बल्कि दुनिया को समझने के नज़रिये, रोजमर्रा की भाषा, राजनीतिक तेवर और सामाजिक व्यवहार पर भी बहुत गहराई से पड़ता है।

 

लेफ़्ट और राईट यानी दोनों ही कैडर आधारित संगठनों, जहाँ बहुत कड़ा राजनीतिक प्रशिक्षण होता है, पर ख़ासतौर से यह बात लागू होती है। थोड़े समय तक वामपंथ या दक्षिणपंथ के प्रभाव में आये लोगों पर यह बात लागू नहीं होती है। लेकिन जिनका समूचा वैचारिक विकास इन सगठनों के साए में होता है, उनके व्यक्तित्व में उनकी ट्रेनिंग दूध और पानी की तरह घुल जाती है।

 

कोई भी व्यक्ति नयी पार्टी कब ज्वाइन करता है ? पहली वजह— किसी अच्छे अवसर की तलाश में कोई अपने मूल्यों, आस्थाओं और विचारों से समझौता कर ले। सामान्य भाषा में इसे “अवसरवाद” तथा वामपंथी शब्दावली में “समझौतावाद” या “संशोधनवाद” कहा जाता है।

 

दूसरी, जब उसे अहसास हो जाये कि उसकी मूल पार्टी अपनी समकालीन चुनौतियों का सामना करने में असमर्थ है या हो चुकी है। ऐसी स्थिति में वो एक नयी राजनीतिक यात्रा की शुरुआत करने का निश्चय करता है। नए राजनीतिक परिवेश, संस्कृति और परंपरा के साथ तारतम्य बिठाने के लिए वो या तो अपनी मूल स्थापनाओं को तिलांजलि देता है या फिर उनको चुनौती देते हुए एक नयी विचारधारात्मक यात्रा पर निकल पड़ता है।

 

इस यात्रा की बुनियादी शर्त ही यह है कि व्यक्ति नया सोचने और नया सीखने के लिए मानसिक रूप से तैयार है। राजनीतिक दृष्टि से कहें तो यही उसके मेटामॉर्फ़ोसिस या कायापलट की शुरुआत है। कई लोग इस प्रक्रिया का सामना करने से हिचकते हैं और राजनीतिक रूप से निष्क्रिय हो जाते हैं।

 

कम्युनिस्ट पॉलिटिक्स के कई लोग इस ‘डॉग्मा’ को तोड़ नहीं पाते और ख़ुद को महज़ बौद्धिक गतिविधियों तक समेट लेते हैं। क्योंकि लम्बे समय तक गाँधीजी को “मैस्कॉट ऑफ़ बुर्जुआज़ी” और “जोनाह ऑफ़ रेवोलुशन” मानने के बाद अचानक उनमें एक क्रांतिकारी की खोज एक जटिल और लम्बी बौद्धिक प्रक्रिया है।

 

इसलिए धुर कम्युनिज्म की रेडिकल ट्रेनिंग से निकलकर वाया अन्ना आन्दोलन और आम आदमी पार्टी Uttar Pradesh (Congress)  पर कब्ज़े की कोशिशों की इंटेलेक्चुअल ट्रेजेक्टरी (वैचारिक प्रक्षेपपथ), गाँधी-नेहरू का प्रतिबद्ध शिष्य होने के नाते, ट्रेस करना एक ख़ालिस राजनीतिक सवाल है, व्यक्तिगत नहीं। यह तय है वैचारिक कायापलट के बिना किसी पार्टी संगठन पर आकर प्रभुत्व जमाने की कोई सतही कोशिश अर्थ का अनर्थ कर देती है।

 

ऐसे समझिये कि कोई पुरानी पार्टी का दिल-दिमाग और गुर्दा लाकर नयी पार्टी के शरीर में ज़बरदस्ती फिट करने की कोशिश करे और मरीज़ की हालत सुधरने के बजाय बिगड़ती चली जाए। कांग्रेस की गाँधीवादी और नेहरूवादी छवि के नीचे जाने-अनजाने Uttar Pradesh (Congress)  की एक ऐसी सर्जरी चल रही है जो दरअसल पोस्टमॉर्टेम न बन जाए, यही चिंता है।

 

Note---ये लेखक के निजी विचार हैं।