Gorakhpur की सीमा से सटे Sant Kabir Nagar में BJP सांसद और विधायक के बीच हुए “जूता कांड” के बाद अब Uttar Pradesh के पूर्वांचल में 60 सालों से चली आ रही “ब्राम्हण बनाम ठाकुर” की “जंग” एक बार फिर खुलकर सामने आ गई है। “जूता कांड” के बाद ब्राम्हण वर्ग जहां सांसद के इस कृत्य को जायज ठहरा रहा है तो दूसरी तरफ विधायक और उनके समर्थक इस पूरे कांड की सहानुभूति लेकर जिले की राजनीति में जातीय समीकरण फिट करने की कोशिश में जुट गए हैं। जानकारों की मानें तो लोकसभा का चुनाव नजदीक है और ये दोनों ही जातियां बीजेपी के कोर वोटर हैं। ऐसे में बीजेपी के लिए सबसे बड़ी चुनौती ये है कि कैसे 60 साल बाद फिर भड़की जातीय “ज्वालामुखी” को कैसे शांत किया जाए। दशकों पुरानी इस जातीय "जंग" में कई बार गोलियों की बौंछार और बमों के धमाके भी हो चुके हैं। हरिशंकर तिवारी और वीरेंद्र शाही के बीच 90 के दशक में चला खूनी गैंगवार भी सभी को मालुम है। फिलहाल वर्तमान में “हाता Vs मठ” में वर्चस्व के “जंग की कहानी" हर किसी की जुबान पर है।
YOGESH TRIPATHI

तब हरिशंकर और वीरेंद्र शाही के बीच श्रीप्रकाश शुक्ला ने की थी एंट्री
गोरखपुर पूर्वांचल की राजनीति का प्रमुख केंद्र है। यहां बाबा साहब (ब्राम्हण) और बाबू साहब (ठाकुर) के बीच वर्चस्व की जंग कोई नई नहीं है बल्कि ये करीब 60 साल पुरानी है। जहां ठाकुर राजनीति का केंद्र गोरखनाथ मंदिर के हाथों में रहा है तो वहीं ब्राम्हणों की राजनीति हरिशंकर तिवारी से लेकर अमरमणि त्रिपाठी और अब शिव प्रताप शुक्ला के हाथों है। इससे पहले ब्राम्हणों की ये कमान विधायक पर जूतों की बौंछार करने वाले सांसद शरद त्रिपाठी के पिता रमापति राम के पास रही। उनकी भी यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से तब के रिश्ते सभी को पता हैं। 80 और 90 के दशक में हरिशंकर तिवारी बनाम वीरेंद्र शाही का दौर रहा। इन दोनों के बीच खूनी रंजिश भी किसी से छिपी नहीं है। दोनों के बीच लंबे समय तक गैगवार रहा। दोनों ने स्थानीय स्तर पर छुटभैया अपराधियों की लंबी-चौड़ी फौज भी खड़ी की। दोनों को तगड़ी चुनौती दी थी अंडरवर्ल्ड डॉन श्रीप्रकाश शुक्ला ने। ये वो दौर था जब पूर्वांचल में खून-खराबा आम बात थी।
60 साल पहले गोरखपुर यूनिवर्सिटी को लेकर शुरु हुई थी जाति की “जंग”
ब्राह्मण-ठाकुर की ये लड़ाई 1960 के दशक में शुरू हुई थी। तब गोरखनाथ मंदिर की कमान महंत दिग्विजय नाथ के हाथों में थी। जबकि गोरखपुर में सुरति नारायण मणि त्रिपाठी जिलाधिकारी थे, उस समय गोरखपुर यूनिवर्सिटी की नींव रखी जानी थी। जानकारों की मानें तो यूनिवर्सिटी के लिए जमीन अधिग्रहण और नाम को लेकर दोनों के बीच ऐसा विवाद हुआ जो आज तक नहीं थमा। विवाद तब और बढ़ गया जब जिलाधिकारी सुरति नारायण मणि त्रिपाठी स्थानीय नेता और बाहुबली माफिया हरिशंकर तिवारी को संरक्षण देने लगे। इसके बाद गोरखनाथ मठ की कमान महंत अवैद्यनाथ के पास आई तो उस समय हरिशंकर तिवारी काफी बड़े नेता बन चुके थे। उनके नाम का डंका यूपी के बाहर भी बजता था। ब्राह्मण राजनीति की बागडोर उनके हाथ में थी। जानकारों की मानें तो हरिशंकर तिवारी को बैकफुट पर करने के लिए ही मठ ने बैकडोर से वीरेंद्र शाही पर हाथ रखा। ये वो दौर था जब गोरखपुर का क्राइम रेट सबसे अधिक था।
योगी की राजनीति में एंट्री के बाद फिर जातीय सियासत
योगी के राजनीति में आते ही उनका पहला आमना-सामना बीजेपी के ब्राह्मण नेतृत्व से हुआ। 2002 के विधानसभा चुनाव में सांसद योगी आदित्यनाथ ने लगातार पांच बार से विधायकी का चुनाव जीत रहे शिव प्रताप शुक्ला का टिकट कटवाने के लिए पूरा जोर लगाया। जब टिकट नहीं कटवा पाए तो हिंदू महासभा के उम्मीदवार के रुप में राधे मोहनदास अग्रवाल को खड़ा कर शिव प्रताप शुक्ला को चुनाव हरवा दिया।
2014 के लोकसभा चुनाव में योगी के विरोध के बाद भी बीजेपी ने गोरखपुर के आस-पास कुशीनगर, देवरिया, बस्ती, संत कबीर नगर में ब्राह्मण उम्मीदवारों को टिकट दिया और सभी चुनाव भी जीते। लेकिन 2017 में योगी के मुख्यमंत्री बनने के बाद गोरखपुर में ठाकुर और ब्राह्मण का विवाद और बढ़ गया। बीजेपी का नुकसान होने लगा तो नुकसान की भरपाई के लिए ही बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व ने योगी की बात को नजरअंदाज करते हुए उपचुनाव में सीट मठ को नहीं दी। उपेन्द्र शुक्ला को उम्मीदवार बनाया लेकिन वो चुनाव हार गए, दबी जुबान में ये चर्चा भी हुई कि योगी ने उपेन्द्र शुक्ला का साथ नहीं दिया। इस जूता कांड को देश और प्रदेश की राजनीति में चाहे जो असर हो लेकिन गोरखपुर और आस-पास के इलाके की राजनीति में इसे पुराने ब्राह्मण-ठाकुर की राजनीतिक लड़ाई से जोड़कर देखा जा रहा है।
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जूता चलाने वाले बीजेपी सांसद शरद त्रिपाठी और थप्पड़ मारने वाले विधायक राकेश बघेल।[/caption]
ठाकुर बिरादरी से आते हैं विधायक राकेश बघेल
मेंहदावल के विधायक राकेश बघेल ठाकुर बिरादरी से आते हैं। संत कबीर नगर के ठाकुर वर्ग में उनका खासा प्रभाव भी है खासकर मेंहदावल विधान सभा के अंतर्गत तो और अधिक है। वहीं, ब्राम्हण वर्ग का झुकाव सजातीय शरद त्रिपाठी की तरफ है। खबरों की मानें तो शरद त्रिपाठी के टिकट कटने की चर्चाएं लंबे समय से हो रही हैं। अपनी राजनीतिक पकड़ के बल पर राकेश बघेल लोकसभा की प्रत्याशिता के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाए हैं। इस बात की चर्चा पूरे जनपद में है। चर्चा ये भी है कि पुलिस विभाग में एक करीबी की ट्रांसफर-पोस्टिंग को लेकर भी सांसद और विधायक के बीच लंबे समय से “शीतयुद्ध” चल रहा था। शिलापट्ट में नाम न होने पर जब मीटिंग में सांसद ने चीफ इंजीनियर से सवाल-जवाब किया तो पास में ही बैठे विधायक ने हेकड़ी दिखाते हुए जूता उतारने की की धमकी दी। उन्होंने धमकी दी और सांसद ने जूतों की बौंछार कर दी।
विधायक अपनों के बीच ब्राम्हणों को कहते हैं Vitamin-B
चर्चा है कि मेंहदावल विधायक अक्सर जातिवाद की राजनीति से प्रेरित होकर काम करते हैं। अपने लोगों के बीच वो ब्राम्हणों को Vitamin-B कहते हैं। इतना ही नहीं ब्राम्हणों को लेकर उनका और उनके समर्थकों का नजरिया भी ठीक नहीं है। बताया जा रहा है कि जूतमपैजार के बाद अब ब्राम्हणों ने भी ये कहना शुरु कर दिया है कि इसे कहते हैं Vitamin-B।
ब्राम्हण मतदाताओं में है बीजेपी के प्रति खासी नाराजगी
संत कबीर नगर हो या फिर गोरखपुर, बस्ती। करीब-करीब पूर्वांचल के हर जिले का ब्राम्हण वोटर भाजपा से काफी नाराज चल रहा है। खुद यूपी की सीएम के कार्यक्षेत्र गोरखपुर का हाल बेहद खराब है। मीडिया और स्थानीय लोगो की मानें तो यहां जाति को पूछने के बाद ही उसका काम किया जाता है। नाम के आगे यदि ब्राम्हण लिखा है तो लीगल काम भी ब्राम्हणों के नहीं होते हैं। उत्पीड़न भी चरम पर हो रहा है। एक साल पहले की बात है जब एक ठाकुर बिरादरी के विधायक भाई का आडियो सोशल मीडिया में जारी हुआ था। विधायक के भाई ने ब्राम्हण वर्ग के शराब ठेकेदार को धमकी देते हुए कहा था कि ठेका छोड़ दो नहीं तो खैर नहीं...।
कांग्रेस या BSP में डॉयवर्ट हो सकता है ब्राम्हण मतदाता
लंबे समय से कोमा में पड़ी कांग्रेस पार्टी को लगता है लोकसभा 2019 के चुनाव में संजीवनी मिल जाएगी। राजनीति के जानकारों की मानें तो लंबे समय से उपेक्षित ब्राम्हण वर्ग कांग्रेस में वोट कर सकता है। वैसे संत कबीर नगर में कुशल तिवारी के पक्ष में माहौल बन रहा है। कुशल तिवारी गोरखपुर के बाहुबली विधायक और पूर्व मंत्री रहे हरिशंकर तिवारी के बेटे हैं। खलीलाबाद संसदीय सीट से वो सांसद रह चुके हैं। 2014 में मोदी लहर में वे चुनाव हार गए। राजनीति के जानकारों की मानें तो खलीलाबाद में ब्राम्हण वोटर एक बार फिर कुशल तिवारी की तरफ डायवर्ट होता दिख रहा है तो वहीं अन्य जिलों में कांग्रेस की तरफ जा सकता है।
नोट---www.redeyestimes.com (News Portal) ने जनवरी 2019 में पूर्वांचल की कई लोकसभा सीटों पर जनता से सीधी बातचीत की थी। इसमें भी ब्राम्हण और ठाकुर फैक्टर खुलकर सामने आया था। “जूता कांड” के बाद अब ब्राम्हण वर्ग सीधे तौर पर तो कुछ नहीं कह रहा है लेकिन अंदर ही अंदर वो सबक सिखाने के मूड में दिखाई दे रहा है। गौरतलब है कि यदि ब्राम्हण वोट का डॉयवर्ट हुआ तो बीजेपी को इसकी भारी क्षति उठानी पड़ सकती है। हालांकि ब्राम्हणों की नाराजगी को दूर करने के लिए ही शिवप्रताप शुक्ला को केंद्र की कैबिनेट में राज्यमंत्री बनाया गया। गोरखपुर संसदीय सीट के उपचुनाव में ब्राम्हण प्रत्याशी को चुनाव लड़वाया गया लेकिन इन सबके बाद भी ब्राम्हण मतदाता किसी “खास” से काफी नाराज है। इस बात का अंदाजा बीजेपी के हाईकमान को भी है।