• 21 फरवरी 1947 को लालता प्रसाद ने मौला बक्श को की थी मकान की रजिस्ट्री 
  • 19 मार्च 1967 को मौला बक्श ने रहमान को हिबानामा (Gift) किया 
  • 28 दिसंबर 1982 आबिद रहमान ने हाजरा खातून को रजिस्टर्ड बैनामा किया
  • 13 जुलाई 2009 को हाजी मुख्तार ने यह संपत्ति हाजरा खातून से क्रय की
  • 17 फरवरी 2002 को रामजानकी मंदिर यशोदा नगर में शिफ्ट किया गया 
  • न कोई Pakistan गया और न कोई आया तो फिर शत्रु संपत्ति कैसे...?
  • 20 वर्ष पहले रामजानकी मंदिर गुप्ता परिवार ने शिफ्ट कर लिया तो फिर विवाद क्यूं...?


Yogesh Tripathi

Kanpur के बेकनगंज एरिया में जिस भूमि पर मशहूर "बाबा स्वीट एंड रेस्टोरेंट" स्थित है, दरअसल उस मकान को भगवानदीन के लड़के लालता प्रसाद ने देश  आजाद होने से करीब छह महीना पहले 21 फरवरी 1947 को बेंच दिया था। लालता प्रसाद की इस प्रापर्टी को किसी और ने नहीं बल्कि हाजी मौला बक्श ने क्रय (खरीदी) की थी। मकान की रजिस्ट्री करते समय जो चौहद्दी अभिलेखों में दर्ज है उसके मुताबिक गर्बी (पश्चिमी तरफ) ठाकुरद्वारा (रामजानकारी मंदिर) और अहाता मोहम्मद आमीन दर्ज है। जबकि शर्की (पूरब की तरफ) दरवाजा हारा दुकानात, मकान मुबैइया व तबूतरा मुतालिक मकान हाजा बादहू फुटपाथ व सरकारी सड़क दर्ज है। जुनूबी (दक्षिण की तरफ) दीवार मकान हाजहा बादहू आराजी उफ्तादाता अंकित है। जबकि शुमली (उत्तर की तरफ) दरवाजा दुकान व रास्ता आमदो रफत अंदुरून मकान व चबूतरा मुताल्लिक मकान मुबैइया बादहू सड़क सरकारी दर्ज है। खास बात ये है कि मकान नंबर 99/14 का क्रय और विक्रय करने वाले जब कभी Pakistan or China जाकर बसे नहीं तो फिर प्रापर्टी को क्यूं और कैसे "शत्रु संपत्ति" बताया जा रहा है...? हां ये सच है कि हिबानामा (Gift Paper) के आधार पर हाजरा खातून को वर्ष 28 दिसंबर 1982 में रजिस्ट्री करने वाले आबिद रहमान (London) जाकर बस गए लेकिन उससे पहले उन्होंने अपने पुरखों से दान में मिली पैतृक संपत्ति की रजिस्ट्री कर दी थी। तो फिर "शत्रु संपत्ति" का राग अलापने की आखिर वजह क्या है...?


मकान नंबर 99/14 जिस रामजानकी मंदिर (ठाकुरद्वारा) के वर्षों पहले स्थापित होने की बात कही जा रही है वो भी सच है लेकिन 17 फरवरी 2002 को लालता प्रसाद के पौत्र और उनके परिवारीजन शोभायात्रा के बाद अपने पारिवारिक मंदिर को नौबस्ता के यशोदानगर स्थित शंकराचार्य नगर में शिफ्ट कर दिया यह भी हकीकत है। मौला बक्श को अपना मकान वर्ष 47 में बिक्री करने वाले लालता प्रसाद के पौत्र शिवशरण गुप्ता की तरफ से भू-माफिया सेल के प्रभारियों को दिए गए हलफनामें से ये बात पूरी तरह से पुख्ता है कि मंदिर को गुप्ता परिवार अपने नए घर में शिफ्ट कर चुका है तो फिर उक्त भूमि पर रामजानकारी मंदिर (ठाकुरद्वारा) मौजूद होने का "बवंडर" क्यों....? 


अपर नगर मजिस्ट्रेट (तृतीय) कानपुर नगर की तरफ से वर्ष 2019 में जारी Final Report के मुताबिक वर्तमान समय में मकान नंबर 99/14 A के Land Owner हाजी मुख्तार ने भू-माफिया सेल के दोनों पूर्व प्रभारियों प्रकाश स्वरूप पांडेय और सुरेंद्र नाथ तिवारी को जो कागजात सौंपे वह जांच में पूरी तरह से सही पाए गए। शिकायतकर्ता कैसरजहां ने पुराना मकान नंबर 99/14 में रामजानकी मंदिर (नगर निगम के अभिलेखों में ठाकुरद्वारा) अंकित है को लेकर शिकायत दर्ज कराई थी। इस बाबत 51-A शंकराचार्य नगर (यशोदानगर) नौबस्ता निवासी शिवशरन गुप्ता ने खुद भू-माफिया सेल और ACM (3rd) को हलफमाना देकर बताया है कि मंदिर सार्वजनिक नहीं था बल्कि उनके परिवार का निजी था। इस मंदिर को वह शंकराचार्य स्थित अपने मकान में वर्ष 2002 में पूजा-अर्चना और मूर्तियों की प्राण-प्रतिष्ठा के बाद शिफ्ट कर चुके हैं। शिवशरन के बयानों और हलफमानों के आधार पर पुलिस की भूू-माफिया सेल ने उनके परबाबा (बाबा के पिता) भगवानदीन की वंशावली बनाते हुए Report के साथ संलग्न किया है। "यक्ष प्रश्न" ये है कि जब मंदिर वहां से अन्यंत्र स्थापित किया जा चुका है तो फिर इतनी हाय-तौबा क्यों और किसकी शह पर की जा रही है..? क्या तीन-तीन राजपत्रित अधिकारियों ने झूठी रिपोर्ट लगाकर शासन-प्रशासन को सौंपी थी...? यदि सौंपी थी तो उन अधिकारियों पर कार्रवाई क्यों नहीं...? और यदि रिपोर्ट पूरी तरह से सच है तो फिर "शत्रु संपत्ति" और Old Temple होने का "सियासी खेल" क्यों खेला जा रहा है...?


ACM (3rd) की रिपोर्ट का सबसे अहम पहलू ये है कि किरायेदारों, पड़ोसियों के साथ-साथ उन्होंने भू-माफिया सेल के दो पूर्व प्रभारियों प्रकाश स्वरूप पांडेय, सुरेंद्र नाथ तिवारी की रिपोर्ट के साथ-साथ नगर निगम की आख्या को भी प्रमुखता से आधार बनाया है। साथ ही बेकनगंज के पूर्व थानेदार के नजरी नक्शा, मौके पर कराई गई वीडियोग्राफी, मकान में अब तक हुए सभी रजिस्टर्ड बैनामा, हिबानामा के कागजातों को प्रमुख साक्ष्य माना है। साथ ही मंदिर के मालिक गुप्ता परिवार की वंशावली को उजागर करते हुए उसका प्रमुखता से उल्लेख इसी लिए किया कि भविष्य में किसी तरह का कोई विवाद उत्पन्न न हो। 


क्या होती है शत्रु या दुश्मन संपत्ति...?

भारत-पाकिस्तान और भारत-चीन युद्धों के बाद देश को छोड़कर जाने वाले लोगों की चल और अचल संपत्तियों का स्वामित्तव सरकार ने अपने हाथों में ले लिया। देस के विभिन्न प्रांतों में फैली इन बेशकीमती संपत्तियों को शत्रु संपत्ति या फिर दुश्मन संपत्ति के रूप में जाना जाता है। Uttar Pradesh में सबसे अधिक "शत्रु संपत्तियां" हैं। "द क्सटोडियन ऑफ एनमी प्रॉपर्टी फॉर इंडिया" (CEPI) भारत रक्षा अधिनियम 1939 के तहत स्थापित शत्रु संपत्तियों का एक कार्यालय है। सभी शत्रु संपत्तियां इसके कब्जे में हैं। 1968 में भारत ने शत्रु संपत्ति की हिरासत और नियंत्रण के लिए "शत्रु संपत्ति अधिनियम" बनाया था। हालांकि Modi Government के पहले कार्यकाल के दौरान वर्ष 2017 में 50 साल पुराने इस कानून में तमाम संशोधन किए गए हैं। करीब ढाई दशक पहले तत्कालन जिलाधिकारी अनीता जैन भटनागर ने शहर की तमाम शत्रु संपत्तियों का ब्यौरा संकलित करवाया था। उस समय शहर भर में मौजूद शत्रु संपत्तियों की कीमत सर्किल रेट के आधार पर करीब 10 हजार करोड़ रुपए से अधिक की आंकी गई थी। शत्रु संपत्तियां Uttar Pradesh के कानपुर, लखनऊ, गोरखपुर, वाराणसी समेत सभी प्रमुख महानगरों में मौजूद हैं। लखनऊ का एक चर्चित कॉफी हाउस भी शत्रु संपत्ति ही है।

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